Thursday, December 18, 2014

शर

बेवजह लफ़्ज़ों को जोड़ कर कोई नज़्म कही जाए,
या कि ज़िन्दगी की नज़्म को लफ़्ज़ों की डोर दी जाए.

खुदापरास्तों ने सर सब्ज़ हवा को शर कर दिया है,
काफिरों ने सहेजी हैं कुछ सांसें, आओ बांटी जाए.

मुर्दा किताबों के हर्फ़ में जब इंसानियत घुटने लगे,
समझो वक़्त हो चला है कि किताब बदल दी जाए.

अब की शायद सेहरा में भी बाग़ लगेंगे,
ये जो नन्हीं लाशें हैं चलो दफ्न की जाए. 

Wednesday, December 17, 2014

उधार

मैं आज भी रुका हूँ वहीँ इंतज़ार सा,
तेरे स्पंदन से स्पंदित तार सा,
कश्ती पे टंगी पतवार सा,
मैं आज भी रुका हूँ वहीँ इंतज़ार सा.

टहनियां सब हरे पत्तों से भर गयीं,
ज़मीं तक उतरती धूप शीतल कर गयीं,
रह गया हवाओं में फिर भी खार सा,
मैं आज भी रुका हूँ वहीँ इंतज़ार सा.

उम्रों के टेढ़े रास्ते अब सीधा सा सफ़र है,
हर दीवार से उधड़ता वक़्त का असर है,
रूह पे भारी है अब भी कुछ उधार सा,
मैं आज भी रुका हूँ वहीँ इंतज़ार सा.


Tuesday, May 27, 2014

सराब

आज-कल ज़िन्दगी को थोड़ा कम पीते हैं,

है प्यास बड़ी और प्यासे जीते हैं.

 

रफ़्तार में कहाँ कुछ नज़र आता है कभी,

जो दिखते हैं मंज़र धुंधले दिखते हैं.

 

लोगों से सुनते थे कभी तश्नगी-ए-मंजिल का हाल,

हमें भी हर कदम अब सराब ही मिलते हैं.

 

वो मिल जाएँ कभी तो हमारा हाल कह देना,

फ़रिश्ते कहाँ रोज़ हमारी गली से निकलते हैं.


 

Sunday, May 25, 2014

खानाबदोश


वो घर अपना छोड़ के मकान ढूंढता है,
गली-गली जीने का समान ढूंढता है.
 
खानाबदोशों को मिलता है सफ़र और तनहाई,
कैसे-कैसे दिल में अरमान लिए घूमता है.
 
टुकड़ा-टुकड़ा रोटी के ढेर में दबा,
वो रेहन पर रखे सारे ख्वाब भूलता है.

Thursday, May 22, 2014

मोटी बुद्धि

राघव अभी गेट के अन्दर घुसा ही था, कि शोभा की नरकट सी आवाज़ ने उसके सुकून को तार-तार कर दिया. एक बार तो उसका मन हुआ कि उलटे पाँव वापस चला जाए. जाकर किसी घाट किनारे बैठे या फिर कहीं मंदिर में डेरा डाल लें. पर दिन भर की थकान के बाद उसे बैठने का मन भी नहीं होता. खैर सारी हिम्मत बटोर कर और भारी दिल के साथ वो अन्दर बढ़ गया. बैठक का दरवाज़ा उसके तीन साल के बेटे अंकित ने खोला था. उस बेचारे के चेहरे का भाव देखकर राघव को लगा जैसे आईना देख रहा हो. दरवाज़ा खोल के वो मासूम सी जान लटके हुए मुंह के साथ एक कोने में जा कर बैठ गया. "मुझे नहीं रहना इस घर में और. या तो तुम कोई किराए का मकान खोज लो या मैं जा रही हूँ मायके. मैं कोई नौकरानी नहीं कि सबका खाना बनाती रहूँ दिन भर", शोभा ने फरमान सुना दिया था. राघव की चार साल की शादी में कुछ अगर स्थिर रहा है तो वो है शोभा की अलग हो जाने की मांग. इन चार सालों में से बमुश्किल डेढ़ साल ही शोभा ने ससुराल में गुज़ारे थे. ऐसा नहीं था कि राघव के अन्दर माँ-बाप के लिए समर्पण ज्यादा था, बल्कि उसकी आमदनी इतनी नहीं थी कि वो अलग हो कर एक बच्चे के साथ परिवार संभाल सके. ये बात वो शोभा को समझा-समझा के थक चुका था. पर उसकी मोटी बुद्धि में कुछ घुसे तब ना. ये खिच-खिच अब तो रोज़ की दिनचर्या में शामिल हो गयी थी. राघव ने चुप-चाप मुंह-हाथ धोया, खाना खाया और अपने कमरे की तरफ बढ़ गया. शोभा के कमरे में आने से पहले वो एक झपकी ले लेना चाहता था. हालांकि उस दिन सोने की बजाय उसने अपने दोस्त अमित को फ़ोन लगा दिया, "यार कहीं एक कमरे का मकान देख ज़रा. और सुन किराया तीन-चार हज़ार से ज्यादा नहीं होना चाहिए." फ़ोन रखने के बाद राघव सोने की कोशिश करने लगा.

Tuesday, May 20, 2014

लड्डू

उसने कुछ देर इधर-उधर देखा और फिर धीरे से सब की नज़र बचा कर एक लड्डू उठा लिया. अब भला उससे कैसे इतना देर इंतज़ार होता कि पहले भगवान जी खा लें फिर वो खाये. और ऐसा भी नहीं है कि उसने संयम नहीं रखा. माँ के कहने पर पिछले दो घंटे से खुद को संभाले बैठा है. कभी कोई बोलता राहुल ये ले आ, तो कोई कहता कि राहुल ये पहुंचा दे. बेचारा बच्चा एक अदद लड्डू के लिए सब की सुन रहा था. सब खाली अपने में मगन थे, किसी से ये नहीं हुआ कि एक लड्डू उसे दे ही दें. कहाँ तो कहते फिरेंगे की बच्चे भगवान का रूप होते हैं. जब भगवान के लिए बच्चे को तरसाते हैं तब याद नहीं आता. खैर राह देखते-देखते जब राहुल से रहा नहीं गया तो उसने मन ही मन भगवान जी को सॉरी कहा और पहले खुद को भोग लगा लिया. भगवान जी तो शायद उसकी इस हरकत पर मुस्कुरा रहे थे पर उसकी बुआ से ये बात सहन नहीं हुई. आखिर बच्चों को सही-गलत का पता होना चाहिए की नहीं. बस ज़िन्दगी का यही फ़लसफ़ा सीखाने के उद्देश्य से बुआ ने उस बेचारे के हाथ से लड्डू छीन लिया. इतना ही नहीं उसे सब के सामने दो-चार सुना भी दी. राहुल सुखा सा मुंह ले कर वहां से चला गया. बुआ जी ने वो लड्डू वापस थाल में रखा और उसे उठा कर पीछे कमरे में रखने चली गयी. कमरे में थाल रख कर बुआ अभी पलती ही थीं कि उनकी नज़र अपनी भाभी की साड़ी के नीचे से झांकते 500 रुपये के नोट पर पड़ी. बुआ जी ने कुछ देर इधर-उधर देखा और...

Monday, May 19, 2014

काफ़िर

मुश्किलों में देख कर कश्ती अपनी वो रोने लगे,
काफ़िर भी ख़ुदा के नाम से आस्तीनें भिगोने लगे.

इन आतिश-फ़िशानी राहों का जब इल्म था तुम्हें,
फ़िर क्यों दामन-ए-हयात में यूँ सपने पिरोने लगे.

कुव्वते बर्दाश्त से बढ़ने लगे जब बोझ ज़िन्दगी के,
लोग बाखुशी खुद को शराब में डुबोने लगे.

तेरी सोहबत का जब से शक है ज़माने को,
हम भी इल्मफरोशों में शामिल होने लगे.

कुछ रोज़ की ही थी वो रोशनी यार की,
हम फिर उन्हीं बेआवाज़ अंधेरों में खोने लगे.

Sunday, May 18, 2014

स्याही

कुछ लिखने की चाहत और कुछ अर्थपूर्ण लिखने में बड़ा फ़र्क है. कागज़-कलम ले कर अगर बैठ भी जाओ तो शब्दों की स्याही नहीं मिलती. और अगर थोड़ी मशक्कत करके शब्दकोष से थोड़ी सी स्याही ले भी ली तो भावनाओं का खुरदुरापन कागज़ पर उतरने लगता है. फिर जो कुछ थोड़ा-बहुत पढ़ने लायक होता है वह अकसर खुद को ही समझ नहीं आता. अब आप कहेंगे जनाब यह तो हर लिखने वाले को लगता है कि उसका लिखा दमदार नहीं है. आप अपनी लेखनी लोगों के सामने रखिये और उन्हें तौलने दीजिये. कई बार एक ही चीज़ लगातार देखते रहने से आँखें उनकी बारीकी पकड़ नहीं पातीं. अब बया को थोड़े ही पता होता है कि जो घोंसला उसने बुना है वह क्या लाजवाब है, यह तो हम और आप देख के उसकी खूबसूरती से गदगद हो जाते हैं. लेकिन आप ही बताइये कि परीक्षार्थी जब परीक्षा देकर बाहर आता है तो उसे भली-भांति पता होता है ना कि कितने नंबर पाने वाला है. और जहां तक अपना सवाल है, आज तक हमारा अनुमान गलत नहीं हुआ. खैर साल भर पहले भी एक बार ऐसे ही लिखने के लिए कमर कसी थी पर कुछ नतीजा निकला नहीं था. इस बार फिर ताकत बटोरी है. देखते हैं शब्दों की स्याही कौन सा चित्र उकेरती है...

Wednesday, January 2, 2013

साव देबे न करें कहें पुरे तौलिया!!

अपनी और अपने देश की हालत आजकल कुछ ऐसी ही है।  हमें ऊपर वाले ने दर्शन देने से इनकार कर दिया और देश को सरकार वालों ने।  बड़ी उम्मीद ले के हम पहली तारिख को हाजरी देने गए थे, पर वहां जाके पता चला की आजकल ऊपर वाले को भी सिक्योरिटी की चिंता सत रही है। हमारे कंधे पे काला बैग देखा और सीधा कतार से बाहर।  उनके रखवालों का कहना था की 200 गज के बाहर बैग रख आओ।  हमारे इश्वर को चोट न पहुंचे बाकियों की हमें परवाह नहीं।  हाँ ये डर उसे सिर्फ पुरुष बिरादरी से ही है।  खैर इसमें उसका भी कोई दोष नहीं है, आखिर आज तक सारे युद्ध और हमले हमने ही तो किये हैं। हमने ही तो इंसानियत के चेहरे की छील के बदसूरत कर दिया है। वो तो अब खुद को आईने में देख कर भी डर जाता है।  हाँ हाँ जानता हूँ की कारण हमेशा कुछ और थे पर भैया फेस वैल्यू तो अपनी खराब हो गयी न।  अब करते रहो अभिमान अपने पुरुष होने पे।  चौखटा तो हुई गवा करिया।
अब बात अपने इस महान परम्परावादी, सिद्धांतवादी और निति नियम पालक देश की।  चिंता का विषय ये है की ये सारी ही गुणवत्ता वाली वस्तुएं ही लुप्त होती जा रहीं हैं।  जनता है की अपना गला फाड़ फाड़ के  जिंदा करने की कोशिश में है और सरकार जानती है की अगर वो जिंदा हो गयी तो लुटिया डूब जायेगी। जनता जनार्दन सरकार को महिमामंडित कर रही है, वहीँ सरकार का कहना है की हम तो जनता का ही एक छोटा सा हिस्सा हैं। जो जनता करती है वही  हम करते हैं। आम इंसान (आदमी लिखने में अब शर्मिंदगी होती है) झोली फैलाए बैठा और सरकार मंच पे चढ़ के मुजरा करने के मूड में है।
अब ऐसे में किसे क्या मिलेगा ये तो वो बिल में दुबका इश्वर ही जाने। जब उसकी ही हालत पतली है तो फिर हम तो वैसे भी 200 गज के बाहर हैं।

Sunday, December 23, 2012

शाइस्ता

अभी तो ख्वाब मेरी आँखों के सम्भले भी नहीं थे,
यूँ झकझोर के मुझको क्यों उठा दिया,
ज़िन्दगी कभी तो जी लेने दे।।।

अरसे बाद शाइस्ता प्याले ने लबों को छुआ था,
क्यों बेरहमी से उस प्याले को गिरा दिया,
ज़िन्दगी कभी तो पी लेने दे।

मुद्दतों के बाद तेरी बेरुखी में सुकून आया था ,
तून नज़ाकत से मुझे फिर डरा दिया,
ज़िन्दगी कभी तो सांस लेने दे।