Friday, January 9, 2015

क़फ़स

विरह की गोद में कोई सिर रख कर रोता है,
दर्द मिलता है जब टूट कर इश्क होता है.

दूर तक निगाहों में नफरत और रंजिश के खेत हैं,
बुज़ुर्ग कहते थे काटेगा वही जो तू बोता है.

कितने ही दर-ओ-बाम उजाड़े हैं आजादी के लिए,
लेकर आजादी अपनी अब वो क़फ़स को रोता है.

एक उम्र से ख्वाहिशों के सफ़र में था,
थक गया है देखो कैसे चैन से सोता है.

प्रशांत 

दौर

मेरी बेइंतेहा मसरुफ़ियत देख कर वो,
छोड़ कर मुझे सफ़र पर तनहा निकल गया.

उसके चेहरे को ग़ज़लों में ढूंढता हूँ मैं,
जो एक शेर सा चुपके से निकल गया.

बिखरे हैं तस्बीह के सब दाने ज़मीं पर,
जिसने थाम के रखा था वो धागा निकल गया.

खुद ही रखने होंगे ज़ख्मों पर मरहम अब तुझे,
मसीहाओं का जो दौर था कब का निकल गया.

प्रशांत 

Thursday, January 8, 2015

लिबास

उसकी तकलीफों का एक ही लिबास होता है,
वो चुप हो जाता है जब भी उदास होता है.

सर सब्ज़ पेड़ सारे पत्तों को दफ्न करने लगते हैं,
खिज़ा का मौसम जब पास होता है.

कौन आसानी से खींच लेता है ज़मीं औरों की,
ये हुनर ही इस जहां में ख़ास होता है.

हर चौखट हर दीवार पे जिंदा लाशें टंगी हैं,
ख़ुदा मर गया है ये एहसास होता है.

प्रशांत 

बेतरतीब

तमाम उम्र की दौड़-भाग,
ख्वाहिशों की बेतरह कांट-छांट,
और बेहिसाब चौखटों की धूल पिये,
गयी रात उसकी हामला बेचैनी ने,
एक बेतरतीब सा ख्वाब जना है...

प्रशांत 

Saturday, January 3, 2015

मुकद्दर

रहेगा गम उसे हर उम्र इस बात का,
मेरे साथ कर न सका वो सौदा जज़्बात का.

मेरे इज़हार पर उसने मज़हब पूछ कर,
दे दिया था फ़र्क हमारे ख़यालात का.

जाम है, शाम है और रकीबों का हुजूम,
देखें क्या होगा हश्र इस मुलाकात का.

उसे न दिखा तो उसकी नज़रों का दोष था,
अँधेरे में डूबना तो मुकद्दर है रात का.

प्रशांत 

Friday, January 2, 2015

उम्मीद

आज शाख से फिर एक फूल उतर जाएगा,
उन्हीं बहानों से ये साल भी गुज़र जाएगा.
मैं जानता हूँ की वो मेरा सुकून ले गया है,
मुझे ये भी पता है पूछने पे मुकर जाएगा.
मुद्दतें हो गयीं मुझे घर से निकले हुए,
मेरी छत ले आना कोई जो उधर जाएगा.
मेरा वक़्त हो कर भी मुझे ही नहीं मिलता,
उम्मीद है इस बरस शायद सुधर जाएगा.

प्रशांत 

Thursday, December 18, 2014

शर

बेवजह लफ़्ज़ों को जोड़ कर कोई नज़्म कही जाए,
या कि ज़िन्दगी की नज़्म को लफ़्ज़ों की डोर दी जाए.

खुदापरास्तों ने सर सब्ज़ हवा को शर कर दिया है,
काफिरों ने सहेजी हैं कुछ सांसें, आओ बांटी जाए.

मुर्दा किताबों के हर्फ़ में जब इंसानियत घुटने लगे,
समझो वक़्त हो चला है कि किताब बदल दी जाए.

अब की शायद सेहरा में भी बाग़ लगेंगे,
ये जो नन्हीं लाशें हैं चलो दफ्न की जाए. 

Wednesday, December 17, 2014

उधार

मैं आज भी रुका हूँ वहीँ इंतज़ार सा,
तेरे स्पंदन से स्पंदित तार सा,
कश्ती पे टंगी पतवार सा,
मैं आज भी रुका हूँ वहीँ इंतज़ार सा.

टहनियां सब हरे पत्तों से भर गयीं,
ज़मीं तक उतरती धूप शीतल कर गयीं,
रह गया हवाओं में फिर भी खार सा,
मैं आज भी रुका हूँ वहीँ इंतज़ार सा.

उम्रों के टेढ़े रास्ते अब सीधा सा सफ़र है,
हर दीवार से उधड़ता वक़्त का असर है,
रूह पे भारी है अब भी कुछ उधार सा,
मैं आज भी रुका हूँ वहीँ इंतज़ार सा.


Tuesday, May 27, 2014

सराब

आज-कल ज़िन्दगी को थोड़ा कम पीते हैं,

है प्यास बड़ी और प्यासे जीते हैं.

 

रफ़्तार में कहाँ कुछ नज़र आता है कभी,

जो दिखते हैं मंज़र धुंधले दिखते हैं.

 

लोगों से सुनते थे कभी तश्नगी-ए-मंजिल का हाल,

हमें भी हर कदम अब सराब ही मिलते हैं.

 

वो मिल जाएँ कभी तो हमारा हाल कह देना,

फ़रिश्ते कहाँ रोज़ हमारी गली से निकलते हैं.


 

Sunday, May 25, 2014

खानाबदोश


वो घर अपना छोड़ के मकान ढूंढता है,
गली-गली जीने का समान ढूंढता है.
 
खानाबदोशों को मिलता है सफ़र और तनहाई,
कैसे-कैसे दिल में अरमान लिए घूमता है.
 
टुकड़ा-टुकड़ा रोटी के ढेर में दबा,
वो रेहन पर रखे सारे ख्वाब भूलता है.